Tuesday, 10 May 2022

HAIDAR ALI ATISH KE MASHUR SHER

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...

HAIDAR ALI ATISH KE MASHUR SHER






बुनियादी तौर पर इश्क़-ओ-आशिक़ी के शायर थे। उनके यहां लखनवियत का रंग ज़रूर है लेकिन ख़ुशबू दिल्ली की है। आतिश का असली नाम ख़्वाजा हैदर अली था। उनके बुज़ुर्गों का वतन बग़दाद था, जो आजीविका की तलाश में दिल्ली आए थे और शुजाउद्दौला के ज़माने में फ़ैज़ाबाद चले गए थे। आतिश की पैदाइश फ़ैज़ाबाद में हुई। आतिश गोरे चिट्टे, ख़ूबसूरत, खिंचे हुए डीलडौल और छरहरे बदन के थे। अभी पूरी तरह जवान न हो पाए थे कि वालिद का इंतिक़ाल हो गया और शिक्षा पूरी न हो पाई। दोस्तों के प्रोत्साहन से पाठ्य पुस्तकें देखते रहे। शायरी अपेक्षाकृत देर से लगभग 29 साल की उम्र में शुरू की और मुसहफ़ी के शागिर्द बने। मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन, 19वीं सदी में उर्दू ग़ज़ल का चमकता सितारा। पेश है हैदर अली आतिश कके चुनिंदा अशआर...

न पाक होगा कभी हुस्न ओ इश्क़ का झगड़ा
वो क़िस्सा है ये कि जिस का कोई गवाह नहीं

कुछ नज़र आता नहीं उस के तसव्वुर के सिवा
हसरत-ए-दीदार ने आँखों को अंधा कर दिया




बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक क़तरा-ए-ख़ूँ न निकला

दोस्तों से इस क़दर सदमे उठाए जान पर
दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा

लगे मुँह भी चिढ़ाने देते देते गालियाँ साहब
ज़बाँ बिगड़ी तो बिगड़ी थी ख़बर लीजे दहन बिगड़ा




आप की नाज़ुक कमर पर बोझ पड़ता है बहुत

बढ़ चले हैं हद से गेसू कुछ इन्हें कम कीजिए

अब मुलाक़ात हुई है तो मुलाक़ात रहे
न मुलाक़ात थी जब तक कि मुलाक़ात न थी

हाजत नहीं बनाओ की ऐ नाज़नीं तुझे
ज़ेवर है सादगी तिरे रुख़्सार के लिए




मेहंदी लगाने का जो ख़याल आया आप को
सूखे हुए दरख़्त हिना के हरे हुए

ये दिल लगाने में मैं ने मज़ा उठाया है
मिला न दोस्त तो दुश्मन से इत्तिहाद किया

किसी ने मोल न पूछा दिल-ए-शिकस्ता का
कोई ख़रीद के टूटा पियाला क्या करता




आज तक अपनी जगह दिल में नहीं अपने हुई
यार के दिल में भला पूछो तो घर क्यूँ-कर करें

ऐ फ़लक कुछ तो असर हुस्न-ए-अमल में होता
शीशा इक रोज़ तो वाइज़ के बग़ल में होता

ऐसी ऊँची भी तो दीवार नहीं घर की तिरे
रात अँधेरी कोई आवेगी न बरसात में क्या




काबा ओ दैर में है किस के लिए दिल जाता
यार मिलता है तो पहलू ही में है मिल जाता

शीरीं के शेफ़्ता हुए परवेज़ ओ कोहकन
शाएर हूँ मैं ये कहता हूँ मज़मून लड़ गया



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Thursday, 28 April 2022

अल्लामा इक़बाल के शेर (ALLAMA IQBAL KE FAMOUS SHER)

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...

ALLAMA IQBAL KE FAMOUS SHER




इक़बाल मसऊदी ने हिन्दोस्तान की आज़ादी से पहले "तराना-ए-हिन्द" लिखा था, जिसके प्रारंभिक बोल- "सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा" कुछ इस तरह से थे। उस समय वो इस सामूहिक देशभक्ति गीत से अविभाजित हिंदुस्तान के लोगों को एक रहने की नसीहत देते थे और और वो इस गीत के कुछ अंश में सभी धर्मों के लोगों को 'हिंदी है हम वतन है' कहकर देशभक्ति और राष्ट्रवाद की प्रेरणा देते है।

जन्म 9 नवम्बर 1877
सियालकोट, पंजाब, ब्रितानी भारत
मृत्यु 21 अप्रैल 1938 (उम्र 60)
लाहौर, पंजाब, भारत



अन्य नाम अल्लमा इक़बाल मसऊदी



ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है


माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतज़ार देख

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा


दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूं या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो


फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है


सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसितां हमारा


ढूंढ़ता फिरता हूं मैं 'इक़बाल' अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूं मैं


मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं
तन की दौलत छाँव है आता है धन जाता है धन


नशा पिला के गिराना तो सब को आता है
मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी


दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है

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Wednesday, 20 April 2022

SHAMS TABRIZI KI MAHSURE SHER/GAJAL

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SHAMS TABRIZI KI MAHSURE SHER/GAJAL




शम्स तबरेज़ी की जीवनी पर बहुत कम भरोसेमंद स्रोत उपलब्ध हैं, यह रूमी की भी स्थिति है। कुछ लोग के ख़्याल हैं कि वे किसी जाने माने सूफ़ी नहीं थे, बल्कि एक घुमंतू क़लन्दर थे। एक और स्रोत में यह भी उल्लेख मिलता है कि शम्स किसी दादा हशीशिन सम्प्रदाय के नेता हसन बिन सब्बाह के नायब थे। बाद में शम्स के वालिद ने सुन्नी इस्लाम क़ुबूल कर लिया। लेकिन यह बात शक्की होते हुए भी दिलचस्प इस अर्थ में है कि हशीशिन, इस्माइली सम्प्रदाय की एक टूटी हुई शाख़ थी। और इस्माइली ही थे जिन्होंने सबसे पहला क़ुरआन के ज़ाहिरा (manifest) को नकारकर अव्यक्त अथात् छिपे हुए अर्थों पर ज़ोर दिया, और रूमी को ज़ाहिरा दुनिया को नकारकर रूह की अन्तरयात्रा की प्रेरणा देने वाले शम्स तबरेज़ी ही थे।


1.बहुत कम बोलना अब कर दिया है

कई मौक़ों पे ग़ुस्सा भी पिया है


तुम हम से पूछते हो क्या कि हम ने

बहुत सा काम नज़रों से लिया है


बहुत गर्मी पड़ी अब के बरस भी

मई और जून मुश्किल में जिया है


रफ़ू आँचल पे तेरे है तो सुन ले

गरेबाँ चाक हम ने भी सिया है


तुम्हारी गुफ़्तुगू बतला रही है

किसी से इश्क़ तुम ने भी किया है


बहुत शीर-ओ-शकर हैं हम अदब में

तो 'शम्स' हम में कोई क्या माफ़िया है




2.जो चाहते हो कि मंज़िल तुम्हारी जादा हो

तो अपना ज़ेहन भी इस के लिए कुशादा हो


वो याद आए तो अपना वजूद ही न मिले

न याद आए तो मुझ को थकन ज़ियादा हो


पहाड़ काट दूँ सूरज को हाथ पर रख लूँ

ज़रा ख़याल में शामिल अगर इरादा हो


समझ सको जो ज़माने के तुम नशेब-ओ-फ़राज़

तो अपने अहद के बच्चों से इस्तिफ़ादा हो


ये सोचता हूँ वो जिस दम मिरी तलाश करे

हक़ीक़तों का मिरे जिस्म पर लिबादा हो


है जुस्तुजू मुझे इक ऐसे शख़्स की यारो

जो ख़ुश-मिज़ाज भी हो और दिल का सादा हो


3.किसी की चाह में दिल को जलाना ठीक है क्या


ख़ुद अपने आप को यूँ आज़माना ठीक है क्या


शिकार करते हैं अब लोग एक तीर से दो

कहीं निगाह कहीं पर निशाना ठीक है क्या


बहुत सी बातों को दिल में भी रखना पड़ता है

हर एक बात हर इक को बताना ठीक है किया


गुलाब लब तो बदन चाँद आतिशीं रुख़्सार

नज़र के सामने इतना ख़ज़ाना ठीक है क्या


तमाम शब मिरी आँखों का ख़्वाब रहते हो

तमाम रात किसी को जगाना ठीक है क्या


कभी बड़ों की भी बातों का मान रक्खो 'शम्स'
हर एक बात में अपनी चलाना ठीक है क्या

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#HINDISHER #HINDISHAYARI #HINDI

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Saturday, 26 March 2022

BHADUR SHA JAFAR KE MASHUR SHER

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जफर का जन्म 24 अक्तूबर, 1775 में हुआ था। उनके पिता अकबर शाह द्वितीय और मां लालबाई थीं। अपने पिता की मृत्यु के बाद जफर को 28 सितंबर, 1837 में मुगल बादशाह बनाया गया। यह दीगर बात थी कि उस समय तक दिल्ली की सल्तनत बेहद कमजोर हो गई थी और मुगल बादशाह नाममात्र का सम्राट रह गया था।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की जफर को भारी कीमत भी चुकानी पड़ी थी। उनके पुत्रों और प्रपौत्रों को ब्रिटिश अधिकारियों ने सरेआम गोलियों से भून डाला। यही नहीं, उन्हें बंदी बनाकर रंगून ले जाया गया, जहां उन्होंने सात नवंबर, 1862 में एक बंदी के रूप में दम तोड़ा। उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है। आज भी कोई देशप्रेमी व्यक्ति जब तत्कालीन बर्मा (म्यंमार) की यात्रा करता है तो वह जफर की मजार पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देना नहीं भूलता। लोगों के दिल में उनके लिए कितना सम्मान था उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तान में जहां कई जगह सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है, वहीं पाकिस्तान के लाहौर शहर में भी उनके नाम पर एक सड़क का नाम रखा गया है। बांग्लादेश के ओल्ड ढाका शहर स्थित विक्टोरिया पार्क का नाम बदलकर बहादुर शाह जफर पार्क कर दिया गया है।

1857 में जब हिंदुस्तान की आजादी की चिंगारी भड़की तो सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने उन्हें हिंदुस्तान का सम्राट माना और उनके नेतृत्व में अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी। अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला। भारतीयों ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी।

शुरुआती परिणाम हिंदुस्तानी योद्धाओं के पक्ष में रहे, लेकिन बाद में अंग्रेजों के छल-कपट के चलते प्रथम स्वाधीनता संग्राम का रुख बदल गया और अंग्रेज बगावत को दबाने में कामयाब हो गए। बहादुर शाह जफर ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली, लेकिन मेजर हडस ने उन्हें उनके बेटे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान व पोते अबू बकर के साथ पकड़ लिया।

अंग्रेजों ने जुल्म की सभी हदें पार कर दीं। जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं। आजादी के लिए हुई बगावत को पूरी तरह खत्म करने के मकसद से अंग्रेजों ने अंतिम मुगल बादशाह को देश से निर्वासित कर रंगून भेज दिया।


बहादुर शाह ज़फ़र मुग़ल साम्राज्य के आख़िर शासक होने के साथ-साथ उर्दू शायर भी थे। उन्होंने 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया था। पेश हैं उनके लिखे मशहूर शेर


औरों के बल पे बल न कर इतना न चल निकल
बल है तो बल के बल पे तू कुछ अपने बल के चल



दौलत-ए-दुनिया नहीं जाने की हरगिज़ तेरे साथ
बाद तेरे सब यहीं ऐ बे-ख़बर बट जाएगी

इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल




इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल
दुनिया है चल-चलाव का रस्ता सँभल के चल



जो तू हो साफ़ तो कुछ मैं भी साफ़ तुझ से कहूँ
तेरे है दिल में कुदूरत कहूँ तो किस से कहूँ

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें




कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में



कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें




तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया



बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी

ये चमन यूँ ही रहेगा और हज़ारों बुलबुलें




ये चमन यूँ ही रहेगा और हज़ारों बुलबुलें
अपनी अपनी बोलियाँ सब बोल कर उड़ जाएँगी



हमदमो दिल के लगाने में कहो लगता है क्या
पर छुड़ाना इस का मुश्किल है लगाना सहल है

YE BHI PADIYEADA JAFRI KE FAMOUS SHER

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Thursday, 10 March 2022

KABIR DAS JI KE MASHUR DHOHE

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कबीर दास जी के मशहूर दोहे :

Thursday, 6 January 2022

MIRJA RAFI SODA KE MASHUR SHER



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सौदा का जन्म वर्ष पक्का नहीं है लेकिन कुछ तज़किरों में ११२५ हिजरी (यानि १७१३-१७१४ ईसवी) बताया गया है। वे दिल्ली में पैदा और बड़े हुए और मुहम्मद शाह के ज़माने में जिए। धर्म के नज़रिए से उनका परिवार शिया था। उनके पहले उस्ताद सुलयमान क़ुली ख़ान 'विदाद' थे। शाह हातिम भी उनके उस्ताद रहे क्योंकि अपने छात्रों की सूची में उन्होंने सौदा का नाम शामिल किया था। मुग़ल बादशाह शाह आलम सौदा के शागिर्द बने और अपनी रचनाओं में ग़लतियाँ ठीक करवाने के लिए सौदा को दिया करते थे। सौदा मीर तकी 'मीर' के समकालीन थे। ६० या ६६ की आयु में वे दिल्ली छोड़ नवाब बंगश के साथ फ़र्रूख़ाबाद आ बसे और फिर अवध के नवाब के साथ फैज़ाबाद आ गए। जब लखनऊ अवध रियासत की राजधानी बन गया तो वे नवाब शुजाउद्दौला के साथ लखनऊ आ गए। ७० की आयु के आसपास उनका लखनऊ में ही देहांत हुआ।


सौदा को क़सीदों और तंज़ के सबसे अच्छे शायरों में गिना जाता है। शुरू में वे फ़ारसी में ही लिखा करते थे लेकिन अपने उस्ताद ख़ान-ए-आरज़ू का कहा मानकर उर्दू में भी लिखने लगे। १८७२ में उनकी कुल्लियात को बंगाल रिसाले के मेजर हेनरी कोर्ट (Major Henry Court) ने अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। उनके कुछ चुने शेर इस प्रकार हैं:

१.

“ किसी का दर्द-ए-दिल प्यारे तुम्हारा नाज़ क्या समझे


जो गुज़रे सैद के दिल पर उसे शाहबाज़ क्या समझे ”


—सौदा


२.

“ इश्क़ ज़रा भी अगर हो तो उसे कम मत जान


होके शोला ही बुझे है ये शरार आख़िरकार ”


—सौदा


३.

“ ये रूतबा जाह-ए-दुनिया का नहीं कम किसी मालज़ादी से


के इस पर रोज़-ओ-शब में सैकड़ों चढ़ते-उतरते हैं ”


—सौदा


४.

“ शैख़ ने उस बुत को जिस कूचे में देखा शाम को


ले चराग़ अब ढूंढें है वाँ ता-सहर इस्लाम को ”


—सौदा


५.
“ सावन के बादलों की तरह से भरे हुए


ये वो नयन हैं जिनसे की जंगल हरे हुए ”


—सौदा


GAJAL


जो ज़िक्र बाद मेरे होगा जांनिसारों का
करोगे याद मुझी को कि वो फ़लाना था

बातें कहां गईं वो तेरी भोली-भालियां
दिल ले के बोलता है जो तू अब ये बोलियां




'सौदा' के ज़र्द चेहरे को शोख़ी की राह से
कहता है तेरा रंग तो अब कुछ निखर चला

तेरी गली से गुज़रता हूं इस तरह ज़ालिम
कि जैसे रेत से पानी की धार गुजरे है

दिल पिरोया तो है तुझे ज़ुल्फ़ में हमने लेकिन
ताब गौहर की न लावेगा ये तार आख़िरकार


यों सूरतो-सीरत से बुत कौन सा क़ाली है
पर राह मुहब्बत की दोनों से निराली है

ख़्वाह काबे में क़्वाह मैं बुतखाने में
इतना समझूं कि मेरे यार कहीं देखा है

मिट गए वो शोर दिल के, आह तब आई बहार
वरना क्या-क्या हम भी करते शहर, वीराने में धूम
रुख़सत ऐ बागबां कि तनिक देख लें चमन
जाते हैं वां जहां से फिर आया न जाएगा

ज़िंदगी महबूब, क्या-क्या है इसमें महबूबियां
बेवफ़ाई ने पर इसकी मेट दी सब ख़ूबियां


कोह का प्यारे उठाना ज़ोर मर्दों का नहीं
जो उठावे मुझ सा दिल, समझें उसे मरदाना हम

आवारगी से ख़ुश हूं मैं अपनी कि बादे-मर्ग
हर ज़र्रा मेरी ख़ाक का होवे हवापरस्त

 
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Monday, 15 November 2021

RAVINDERNATH TAGORE KI MASHUR KAVITAYE

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...


रबीन्द्रनाथ टैगोर (१९२५)
स्थानीय नाम রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর
जन्म 07 मई 1861
कलकत्ता (अब कोलकाता), ब्रिटिश भारत[1]l
मृत्यु 07 अगस्त 1941
कलकत्ता, ब्रिटिश भारत[1]
व्यवसाय लेखक, कवि, नाटककार, संगीतकार, चित्रकार
भाषा बांग्ला, अंग्रेजी
साहित्यिक आन्दोलन आधुनिकतावाद
उल्लेखनीय सम्मान साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार
जीवनसाथी मृणालिनी देवी (१ मार्च १८७४–२३ नवंबर १९०२)
सन्तान ५ (जिनमें से दो का बाल्यावस्था में निधन हो गया)
सम्बन्धी टैगोर परिवार





रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं – Rabindranath Tagore Poems in Hindi
चल तू अकेला!

तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो तू चल अकेला,
चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला!
तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो चल तू अकेला,
जब सबके मुंह पे पाश..
ओरे ओरे ओ अभागी! सबके मुंह पे पाश,
हर कोई मुंह मोड़के बैठे, हर कोई डर जाय!
तब भी तू दिल खोलके, अरे! जोश में आकर,
मनका गाना गूंज तू अकेला!
जब हर कोई वापस जाय..
ओरे ओरे ओ अभागी! हर कोई बापस जाय..
कानन-कूचकी बेला पर सब कोने में छिप जाय…
चुप-चुप रहना सखी

चुप-चुप रहना सखी, चुप-चुप ही रहना,
कांटा वो प्रेम का,छाती में बाँध उसे रखना!
तुमको है मिली सुधा, मिटी नहीं अब तक उसकी क्षूधा,
भर दोगी उसमे क्या विष! जलन अरे जिसकी सब बेधेगी मर्म,
उसे खिंच बाहर क्यों रखना!!
पिंजरे की चिड़िया थी

रबिन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ

पिंजरे की चिड़िया थी सोने के पिंजरे में
वन कि चिड़िया थी वन में
एक दिन हुआ दोनों का सामना
क्या था विधाता के मन में

वन की चिड़िया कहे सुन पिंजरे की चिड़िया रे
वन में उड़ें दोनों मिलकर
पिंजरे की चिड़िया कहे वन की चिड़िया रे
पिंजरे में रहना बड़ा सुखकर

वन की चिड़िया कहे ना…
मैं पिंजरे में क़ैद रहूँ क्योंकर
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय
निकलूँ मैं कैसे पिंजरा तोड़कर

वन की चिड़िया गाए पिंजरे के बाहर बैठे
वन के मनोहर गीत
पिंजरे की चिड़िया गाए रटाए हुए जितने
दोहा और कविता के रीत

वन की चिड़िया कहे पिंजरे की चिड़िया से
गाओ तुम भी वनगीत
पिंजरे की चिड़िया कहे सुन वन की चिड़िया रे
कुछ दोहे तुम भी लो सीख

वन की चिड़िया कहे ना ….
तेरे सिखाए गीत मैं ना गाऊँ
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय!
मैं कैसे वनगीत गाऊँ

वन की चिड़िया कहे नभ का रंग है नीला
उड़ने में कहीं नहीं है बाधा
पिंजरे की चिड़िया कहे पिंजरा है सुरक्षित
रहना है सुखकर ज़्यादा

वन की चिड़िया कहे अपने को खोल दो
बादल के बीच, फिर देखो
पिंजरे की चिड़िया कहे अपने को बाँधकर
कोने में बैठो, फिर देखो
वन की चिड़िया कहे ना…
ऐसे मैं उड़ पाऊँ ना रे
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय
बैठूँ बादल में मैं कहाँ रे

ऐसे ही दोनों पाखी बातें करें रे मन की
पास फिर भी ना आ पाए रे
पिंजरे के अन्दर से स्पर्श करे रे मुख से
नीरव आँखे सब कुछ कहें रे

दोनों ही एक दूजे को समझ ना पाएँ रे
ना ख़ुद समझा पाएँ रे

दोनों अकेले ही पंख फड़फड़ाएँ
कातर कहे पास आओ रे

वन की चिड़िया कहे ना….
पिंजरे का द्वार हो जाएगा रुद्ध
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय
मुझमे शक्ति नही है उडूँ ख़ुद
अनसुनी करके

अनसुनी करके तेरी बात
न दे जो कोई तेरा साथ
तो तुही कसकर अपनी कमर
अकेला बढ़ चल आगे रे–
अरे ओ पथिक अभागे रे।

देखकर तुझे मिलन की बेर
सभी जो लें अपने मुख फेर
न दो बातें भी कोई क रे
सभय हो तेरे आगे रे–
अरे ओ पथिक अभागे रे।

तो अकेला ही तू जी खोल
सुरीले मन मुरली के बोल
अकेला गा, अकेला सुन।
अरे ओ पथिक अभागे रे
अकेला ही चल आगे रे।

जायँ जो तुझे अकेला छोड़
न देखें मुड़कर तेरी ओर
बोझ ले अपना जब बढ़ चले
गहन पथ में तू आगे रे–
अरे ओ पथिक अभागे रे।

तो तुही पथ के कण्टक क्रूर
अकेला कर भय-संशय दूर
पैर के छालों से कर चूर।
अरे ओ पथिक अभागे रे
अकेला ही चल आगे रे।

और सुन तेरी करुण पुकार
अंधेरी पावस-निशि में द्वार
न खोलें ही न दिखावें दीप
न कोई भी जो जागे रे-
अरे ओ पथिक अभागे रे।

तो तुही वज्रानल में हाल
जलाकर अपना उर-कंकाल
अकेला जलता रह चिर काल।
अरे ओ पथिक अभागे रे
अकेला बढ़ चल आगे रे।
विपदाओं से रक्षा करो, यह न मेरी प्रार्थना

Rabindranath Tagore Poems in Hindi on Nature


विपदाओं से रक्षा करो-
यह न मेरी प्रार्थना,
यह करो : विपद् में न हो भय।
दुख से व्यथित मन को मेरे
भले न हो सांत्वना,
यह करो : दुख पर मिले विजय।
मिल सके न यदि सहारा,
अपना बल न करे किनारा; –
क्षति ही क्षति मिले जगत् में
मिले केवल वंचना,
मन में जगत् में न लगे क्षय।
करो तुम्हीं त्राण मेरा-
यह न मेरी प्रार्थना,
तरण शक्ति रहे अनामय।
भार भले कम न करो,
भले न दो सांत्वना,
यह करो : ढो सकूँ भार-वय।
सिर नवाकर झेलूँगा सुख,
पहचानूँगा तुम्हारा मुख,
मगर दुख-निशा में सारा
जग करे जब वंचना,
यह करो : तुममें न हो संशय।
रोना बेकार है

व्यर्थ है यह जलती अग्नि इच्छाओं की
सूर्य अपनी विश्रामगाह में जा चुका है
जंगल में धुंधलका है और आकाश मोहक है।
उदास आँखों से देखते आहिस्ता क़दमों से
दिन की विदाई के साथ
तारे उगे जा रहे हैं।

तुम्हारे दोनों हाथों को अपने हाथों में लेते हुए

और अपनी भूखी आँखों में तुम्हारी आँखों को
कैद करते हुए,
ढूँढते और रोते हुए, कि कहाँ हो तुम,
कहाँ ओ, कहाँ हो…
तुम्हारे भीतर छिपी
वह अनंत अग्नि कहाँ है…

जैसे गहन संध्याकाश को अकेला तारा अपने अनंत
रहस्यों के साथ स्वर्ग का प्रकाश, तुम्हारी आँखों में
काँप रहा है,जिसके अंतर में गहराते रहस्यों के बीच
वहाँ एक आत्मस्तंभ चमक रहा है।

अवाक एकटक यह सब देखता हूँ मैं
अपने भरे हृदय के साथ
अनंत गहराई में छलांग लगा देता हूँ,
अपना सर्वस्व खोता हुआ।
नहीं मांगता

Rabindranath Tagore Poems in Hindi on India


मेरा शीश नवा दो अपनी
चरण-धूल के तल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।

अपने को गौरव देने को
अपमानित करता अपने को,
घेर स्वयं को घूम-घूम कर
मरता हूं पल-पल में।

देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।
अपने कामों में न करूं मैं
आत्म-प्रचार प्रभो;
अपनी ही इच्छा मेरे
जीवन में पूर्ण करो।

मुझको अपनी चरम शांति दो
प्राणों में वह परम कांति हो
आप खड़े हो मुझे ओट दें
हृदय-कमल के दल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।
गर्मी की रातों में

गर्मी की रातों में
जैसे रहता है पूर्णिमा का चांद
तुम मेरे हृदय की शांति में निवास करोगी
आश्चर्य में डूबे मुझ पर
तुम्हारी उदास आंखें
निगाह रखेंगी
तुम्हारे घूंघट की छाया
मेरे हृदय पर टिकी रहेगी
गर्मी की रातों में पूरे चांद की तरह खिलती
तुम्हारी सांसें, उन्हें सुगंधित बनातीं
मरे स्वप्नों का पीछा करेंगी।
विविध वासनाएँ

Rabindranath Tagore Poems in Hindi on India


विविध वासनाएँ हैं मेरी प्रिय प्राणों से भी
वंचित कर उनसे तुमने की है रक्षा मेरी;
संचित कृपा कठोर तुम्हारी है मम जीवन में।
अनचाहे ही दान दिए हैं तुमने जो मुझको,
आसमान, आलोक, प्राण-तन-मन इतने सारे,
बना रहे हो मुझे योग्य उस महादान के ही,
अति इच्छाओं के संकट से त्राण दिला करके।
मैं तो कभी भूल जाता हूँ, पुनः कभी चलता,
लक्ष्य तुम्हारे पथ का धारण करके अन्तस् में,
निष्ठुर ! तुम मेरे सम्मुख हो हट जाया करते।
यह जो दया तुम्हारी है, वह जान रहा हूँ मैं;
मुझे फिराया करते हो अपना लेने को ही।
कर डालोगे इस जीवन को मिलन-योग्य अपने,
रक्षा कर मेरी अपूर्ण इच्छा के संकट से।।
मेरे प्यार की ख़ुशबू

मेरे प्यार की ख़ुशबू
वसंत के फूलों-सी
चारों ओर उठ रही है।
यह पुरानी धुनों की
याद दिला रही है
अचानक मेरे हृदय में
इच्छाओं की हरी पत्तियाँ
उगने लगी हैं

मेरा प्यार पास नहीं है
पर उसके स्पर्श मेरे केशों पर हैं
और उसकी आवाज़ अप्रैल के
सुहावने मैदानों से फुसफुसाती आ रही है ।
उसकी एकटक निगाह यहाँ के
आसमानों से मुझे देख रही है
पर उसकी आँखें कहाँ हैं
उसके चुंबन हवाओं में हैं
पर उसके होंठ कहाँ हैं …
होंगे कामयाब

Famous Poems of Rabindranath Tagore in Hindi

होंगे कामयाब,
हम होंगे कामयाब एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन।
हम चलेंगे साथ-साथ
डाल हाथों में हाथ
हम चलेंगे साथ-साथ, एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन।
दिन पर दिन चले गए



दिन पर दिन चले गए पथ के किनारे।
गीतों पर गीत अरे रहता पसारे।।
बीतती नहीं बेला सुर मैं उठाता।
जोड़-जोड़ सपनों से उनको मैं गाता।।
दिन पर दिन जाते मैं बैठा एकाकी।
जोह रहा बाट अभी मिलना तो बाकी।।
चाहो क्या रुकूँ नहीं रहूँ सदा गाता।
करता जो प्रीत अरे व्यथा वही पाता।।

FAIZ AHMAD FAIZ KE MASHUR SHER
KUMAR VISHWAS KE MASHUR SHER


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Tuesday, 12 October 2021

ADA JAFRI KE FAMOUS SHER

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...


इनका जन्म उत्तर प्रदेश, भारत में 22 अगस्त 1924 में हुआ था। इनका बचपन का नाम अज़ीज़ जहान था। वे केवल तीन वर्स्ष की थी जब उन्के पिता, मौलवी बदरूल हसन की मृत्यु हो गयी थी और उनकी माँ ने उनका का पालन-पोषण किया। यह 12 वर्ष के उम्र में ही कविता बनाने लगीं। नुरून हसन जाफरी से लखनऊ में 29 जनवरी 1947 को शादी हो जाती है। शादी के बाद वह अपने पति के साथ लखनऊ से कराची चले जाते हैं। जहाँ नुरून अँग्रेजी और उर्दू समाचार पत्र में एक लेखक बन जाते हैं। 3 दिसम्बर 1995 को नुरून की मौत हो जाती है। इसके बाद वह कराची से टोरोंटो में चले जाती हैं। जहाँ वह उर्दू का प्रचार करती हैं।





हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना


इस क़दर तेज़ हवा के झोंके
शाख़ पर फूल खिला था शायद






आंसू जो रुका वो किश्त-ए-जां में
बारिश की मिसाल आ गया है


मिरा सुकूं भी मिरे आंसुओं के बस में था
ये मेहमां मिरी दुनिया निखारने आते






कुछ यादगार अपनी मगर छोड़ कर गईं
जाती रुतों का हाल दिलों की लगन सा है


सौ सौ तरह लिखा तो सही हर्फ़-ए-आरज़ू
इक हर्फ़-ए-आरज़ू ही मिरी इंतिहा है क्या






आलम ही और था जो शनासाइयों में था
जो दीप था निगाह की परछाइयों में था


तुम पास नहीं हो तो अजब हाल है दिल का
यूं जैसे मैं कुछ रख के कहीं भूल गई हूं






इस क़दर तेज़ हवा के झोंके
शाख़ पर फूल खिला था शायद


दिल के गुंजान रास्तों पे कहीं
तेरी आवाज़ और तू है अभी





Wednesday, 15 September 2021

DAAG DEHLVI KE MASHUR SHER

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...




नवाब मिर्जा खाँ 'दाग़' , उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे। इनका जन्म सन् 1831 में दिल्ली में हुआ। इनके पिता शम्सुद्दीन खाँ नवाब लोहारू के भाई थे। जब दाग़ पाँच-छह वर्ष के थे तभी इनके पिता मर गए। इनकी माता ने बहादुर शाह "ज़फर" के पुत्र मिर्जा फखरू से विवाह कर लिया, तब यह भी दिल्ली में लाल किले में रहने लगे। यहाँ दाग़ को हर प्रकार की अच्छी शिक्षा मिली। यहाँ ये कविता करने लगे और जौक को गुरु बनाया। सन् 1856 में मिर्जा फखरू की मृत्यु हो गई और दूसरे ही वर्ष बलवा आरंभ हो गया, जिससे यह रामपुर चले गए। वहाँ युवराज नवाब कल्ब अली खाँ के आश्रय में रहने लगे। सन् 1887 ई. में नवाब की मृत्यु हो जाने पर ये रामपुर से दिल्ली चले आए। घूमते हुए दूसरे वर्ष हैदराबाद पहुँचे। पुन: निमंत्रित हो सन् 1890 ई. में दाग़ हैदराबाद गए और निज़ाम के कविता गुरु नियत हो गए। इन्हें यहाँ धन तथा सम्मान दोनों मिला और यहीं सन् 1905 ई. में फालिज से इनकी मृत्यु हुई। दाग़ शीलवान, विनम्र, विनोदी तथा स्पष्टवादी थे और सबसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करते थे।

गुलजारे-दाग़, आफ्ताबे-दाग़, माहताबे-दाग़ तथा यादगारे-दाग़ इनके चार दीवान हैं, जो सभी प्रकाशित हो चुके हैं। 'फरियादे-दाग़', इनकी एक मसनवी (खंडकाव्य) है। इनकी शैली सरलता और सुगमता के कारण विशेष लोकप्रिय हुई। भाषा की स्वच्छता तथा प्रसाद गुण होने से इनकी कविता अधिक प्रचलित हुई पर इसका एक कारण यह भी है कि इनकी कविता कुछ सुरुचिपूर्ण भी है।




प्रेम के हर अंदाज को अपने शब्द देने वाले शायरों में दाग़ देहलवी का नाम महत्वपूर्ण है, प्रेम के हर रंग को उन्होंने अपनी शायरी में पिरोया।




1.ख़ुदा रखे मुहब्बत ने किये आबाद घर दोनों
मैं उनके दिल में रहता हूं वो मेरे दिल में रहते हैं

कोई नामो-निशां पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस दाग़ है और आशिकों के दिल में रहते हैं

सितम ही करना, जफ़ा ही करना, निगाहे-उल्फ़त कभी न करना


उर्दू कविता, ग़ज़ल के अमिट हस्ताक्षर दाग़ देहलवी ने रोमांटिक शायरी को नई ऊंचाई दी। भाषा की स्वच्छता तथा प्रसाद गुण होने से इनकी कविता अधिक प्रचलित हुई पर इसका एक कारण यह भी है कि इनकी कविता कुछ सुरुचिपूर्ण भी है।

ये मजा था दिल्लगी का कि बराबर आग लगती
न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता

सितम ही करना, जफ़ा ही करना, निगाहे-उल्फ़त कभी न करना
तुम्हें कसम है हमारे सिर की, हमारे हक़ में कभी न करना

जलवे मेरी निगाह में कौनो मकां के हैं



एक समय तक जब तमाम शायर फ़ारसी में लिखना ही शायर होने की महत्वपूर्ण पहचान मानते थे तब दाग़ साहब ने अपने शायराने मिज़ाज को फ़ारसी जकड़बंदी मुक्त किया और उस समय की आम बोलचाल की भाषा उर्दू के आसान शब्दों में पिरोया था।

जलवे मेरी निगाह में कौनो मकां के हैं
मुझसे कहां छुपेंगे वो ऐसे कहां के हैं

राह पर उनको लगा लाये तो हैं बातों में
और खुल जाएंगे दो-चार मुलाकातों में

क्या जुदाई का असर है कि शबे तन्हाई



उस समय यह बहुत कठिन काम था लेकिन दाग़ ने न सिर्फ न चुनौतियों का सामना किया बल्कि उर्दू शायरी पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

क्या जुदाई का असर है कि शबे तन्हाई
तेरी तस्वीर से नहीं मिलती सूरत मेरी

लूटेंगी वो निगाहें हर कारवाने दिल को
जब तक चलेगा रस्ता ये रहजनी रहेगी

चाह की चितवन में आँख उस की शरमाई हुई


न जाना कि दुनिया से जाता है कोई
बहुत देर की मेहरबां आते-आते

आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता


चाह की चितवन में आँख उस की शरमाई हुई
ताड़ ली मज्लिस में सब ने सख़्त रुस्वाई हुई

ख़बर सुन कर मेरे मरने की वो बोले रक़ीबों से


ख़बर सुन कर मेरे मरने की वो बोले रक़ीबों से
ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियाँ थीं मरने वाले में

तुम को चाहा तो ख़ता क्या है बता दो मुझ को
दूसरा कोई तो अपना सा दिखा दो मुझ को

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

देखना हश्र में जब तुम पे मचल जाऊँगा
मैं भी क्या वादा तुम्हारा हूँ कि टल जाऊँगा

FOR VIDEO:

YE BHI PADIYE :SHERO SHAYARI
                   KHAMOSH
                                                 EK GARIB BCHE KI HANSI



Thursday, 26 August 2021

DEEWANE MIR KE FAMOUS SHER...

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...


ख़ुदा-ए-सुखन मोहम्मद तकी उर्फ मीर तकी "मीर" (1723 - 20 सितम्बर 1810) उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर थे। मीर को उर्दू के उस प्रचलन के लिए याद किया जाता है जिसमें फ़ारसी और हिन्दुस्तानी के शब्दों का अच्छा मिश्रण और सामंजस्य हो। अहमद शाह अब्दाली और नादिरशाह के हमलों से कटी-फटी दिल्ली को मीर तक़ी मीर ने अपनी आँखों से देखा था। इस त्रासदी की व्यथा उनकी रचनाओं मे दिखती है। अपनी ग़ज़लों के बारे में एक जगह उन्होने कहा था-


हमको शायर न कहो मीर कि साहिब हमने
दर्दो ग़म कितने किए जमा तो दीवान किया

जन्म :१७२३

मृत्यु :१८१०




दीवान-ए-मीर से ‘मीर तक़ी मीर’ के 10 बड़े शेर


मीर तक़ी मीर उर्दू और फ़ारसी के एक अज़ीम शाइर हैं, उन्हें ख़ुदा-ए-सुख़न कहा जाता है। पेश हैं दीवान-ए-मीर से कुछ चुनिंदा शेर

मिरे सलीके से, मेरी निभी मुहब्बत में
तमाम उम्र, मैं नाकामियों से काम लिया

कुछ नहीं सूझता हमें, उस बिन
शौक़ ने हमको बेहवास किया




देगी न चैन लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म उस शिकार को
जो खा के तेरे हाथ की तलवार, जाएगा


उनने तो मुझको झूंटे भी न पूछा एक बार
मैंने उसे हज़ार जताया, तो क्या हुआ




दिल की वीरानी का क्या मज़्कूर
यह नगर सौ मरतबा लूटा गया


सख़्त काफ़िर था जिनने पहले मीर
मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया




मह ने आ सामने, शब याद दिलाया था उसे
फिर वह ता सुब्ह मिरे जी से भुलाया न गया


गुल ने हरचन्द से कहा, बाग़ में रह, पर उस बिन
जी जो उचटा, तो किसी तरह लगाया न गया




शहर-ए-दिल आह अजब जाय थी, पर उसके गए
ऐसा उजड़ा कि किसी तरह बसाया न गया


गलियों में अब तलक तो, मज़्कूर है हमारा
अफ़सान-ए-मुहब्बत, मशहूर है हमारा




दिल्ली में आज भीख भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का


मेरे रोने की हक़ीक़त जिसमें थी
एक मुद्दत तक वह काग़ज नम रहा



रात हैरान हूं, कुछ चुप ही मुझे लग गयी मीर
दर्द-ए-पिन्हां थे बहुत, पर लब-ए-इज़हार न था


आए अगर बहार तो अब हम को क्या सबा
हमसे तो आशियां भी गया और चमन गया

ये भी पढ़िए :Faiz Ahamad Faiz ke Famous Sher

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