Tuesday, 10 May 2022

HAIDAR ALI ATISH KE MASHUR SHER

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...

HAIDAR ALI ATISH KE MASHUR SHER






बुनियादी तौर पर इश्क़-ओ-आशिक़ी के शायर थे। उनके यहां लखनवियत का रंग ज़रूर है लेकिन ख़ुशबू दिल्ली की है। आतिश का असली नाम ख़्वाजा हैदर अली था। उनके बुज़ुर्गों का वतन बग़दाद था, जो आजीविका की तलाश में दिल्ली आए थे और शुजाउद्दौला के ज़माने में फ़ैज़ाबाद चले गए थे। आतिश की पैदाइश फ़ैज़ाबाद में हुई। आतिश गोरे चिट्टे, ख़ूबसूरत, खिंचे हुए डीलडौल और छरहरे बदन के थे। अभी पूरी तरह जवान न हो पाए थे कि वालिद का इंतिक़ाल हो गया और शिक्षा पूरी न हो पाई। दोस्तों के प्रोत्साहन से पाठ्य पुस्तकें देखते रहे। शायरी अपेक्षाकृत देर से लगभग 29 साल की उम्र में शुरू की और मुसहफ़ी के शागिर्द बने। मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन, 19वीं सदी में उर्दू ग़ज़ल का चमकता सितारा। पेश है हैदर अली आतिश कके चुनिंदा अशआर...

न पाक होगा कभी हुस्न ओ इश्क़ का झगड़ा
वो क़िस्सा है ये कि जिस का कोई गवाह नहीं

कुछ नज़र आता नहीं उस के तसव्वुर के सिवा
हसरत-ए-दीदार ने आँखों को अंधा कर दिया




बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक क़तरा-ए-ख़ूँ न निकला

दोस्तों से इस क़दर सदमे उठाए जान पर
दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा

लगे मुँह भी चिढ़ाने देते देते गालियाँ साहब
ज़बाँ बिगड़ी तो बिगड़ी थी ख़बर लीजे दहन बिगड़ा




आप की नाज़ुक कमर पर बोझ पड़ता है बहुत

बढ़ चले हैं हद से गेसू कुछ इन्हें कम कीजिए

अब मुलाक़ात हुई है तो मुलाक़ात रहे
न मुलाक़ात थी जब तक कि मुलाक़ात न थी

हाजत नहीं बनाओ की ऐ नाज़नीं तुझे
ज़ेवर है सादगी तिरे रुख़्सार के लिए




मेहंदी लगाने का जो ख़याल आया आप को
सूखे हुए दरख़्त हिना के हरे हुए

ये दिल लगाने में मैं ने मज़ा उठाया है
मिला न दोस्त तो दुश्मन से इत्तिहाद किया

किसी ने मोल न पूछा दिल-ए-शिकस्ता का
कोई ख़रीद के टूटा पियाला क्या करता




आज तक अपनी जगह दिल में नहीं अपने हुई
यार के दिल में भला पूछो तो घर क्यूँ-कर करें

ऐ फ़लक कुछ तो असर हुस्न-ए-अमल में होता
शीशा इक रोज़ तो वाइज़ के बग़ल में होता

ऐसी ऊँची भी तो दीवार नहीं घर की तिरे
रात अँधेरी कोई आवेगी न बरसात में क्या




काबा ओ दैर में है किस के लिए दिल जाता
यार मिलता है तो पहलू ही में है मिल जाता

शीरीं के शेफ़्ता हुए परवेज़ ओ कोहकन
शाएर हूँ मैं ये कहता हूँ मज़मून लड़ गया



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Thursday, 28 April 2022

अल्लामा इक़बाल के शेर (ALLAMA IQBAL KE FAMOUS SHER)

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...

ALLAMA IQBAL KE FAMOUS SHER




इक़बाल मसऊदी ने हिन्दोस्तान की आज़ादी से पहले "तराना-ए-हिन्द" लिखा था, जिसके प्रारंभिक बोल- "सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा" कुछ इस तरह से थे। उस समय वो इस सामूहिक देशभक्ति गीत से अविभाजित हिंदुस्तान के लोगों को एक रहने की नसीहत देते थे और और वो इस गीत के कुछ अंश में सभी धर्मों के लोगों को 'हिंदी है हम वतन है' कहकर देशभक्ति और राष्ट्रवाद की प्रेरणा देते है।

जन्म 9 नवम्बर 1877
सियालकोट, पंजाब, ब्रितानी भारत
मृत्यु 21 अप्रैल 1938 (उम्र 60)
लाहौर, पंजाब, भारत



अन्य नाम अल्लमा इक़बाल मसऊदी



ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है


माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतज़ार देख

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा


दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूं या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो


फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है


सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसितां हमारा


ढूंढ़ता फिरता हूं मैं 'इक़बाल' अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूं मैं


मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं
तन की दौलत छाँव है आता है धन जाता है धन


नशा पिला के गिराना तो सब को आता है
मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी


दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है

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Wednesday, 20 April 2022

SHAMS TABRIZI KI MAHSURE SHER/GAJAL

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...

SHAMS TABRIZI KI MAHSURE SHER/GAJAL




शम्स तबरेज़ी की जीवनी पर बहुत कम भरोसेमंद स्रोत उपलब्ध हैं, यह रूमी की भी स्थिति है। कुछ लोग के ख़्याल हैं कि वे किसी जाने माने सूफ़ी नहीं थे, बल्कि एक घुमंतू क़लन्दर थे। एक और स्रोत में यह भी उल्लेख मिलता है कि शम्स किसी दादा हशीशिन सम्प्रदाय के नेता हसन बिन सब्बाह के नायब थे। बाद में शम्स के वालिद ने सुन्नी इस्लाम क़ुबूल कर लिया। लेकिन यह बात शक्की होते हुए भी दिलचस्प इस अर्थ में है कि हशीशिन, इस्माइली सम्प्रदाय की एक टूटी हुई शाख़ थी। और इस्माइली ही थे जिन्होंने सबसे पहला क़ुरआन के ज़ाहिरा (manifest) को नकारकर अव्यक्त अथात् छिपे हुए अर्थों पर ज़ोर दिया, और रूमी को ज़ाहिरा दुनिया को नकारकर रूह की अन्तरयात्रा की प्रेरणा देने वाले शम्स तबरेज़ी ही थे।


1.बहुत कम बोलना अब कर दिया है

कई मौक़ों पे ग़ुस्सा भी पिया है


तुम हम से पूछते हो क्या कि हम ने

बहुत सा काम नज़रों से लिया है


बहुत गर्मी पड़ी अब के बरस भी

मई और जून मुश्किल में जिया है


रफ़ू आँचल पे तेरे है तो सुन ले

गरेबाँ चाक हम ने भी सिया है


तुम्हारी गुफ़्तुगू बतला रही है

किसी से इश्क़ तुम ने भी किया है


बहुत शीर-ओ-शकर हैं हम अदब में

तो 'शम्स' हम में कोई क्या माफ़िया है




2.जो चाहते हो कि मंज़िल तुम्हारी जादा हो

तो अपना ज़ेहन भी इस के लिए कुशादा हो


वो याद आए तो अपना वजूद ही न मिले

न याद आए तो मुझ को थकन ज़ियादा हो


पहाड़ काट दूँ सूरज को हाथ पर रख लूँ

ज़रा ख़याल में शामिल अगर इरादा हो


समझ सको जो ज़माने के तुम नशेब-ओ-फ़राज़

तो अपने अहद के बच्चों से इस्तिफ़ादा हो


ये सोचता हूँ वो जिस दम मिरी तलाश करे

हक़ीक़तों का मिरे जिस्म पर लिबादा हो


है जुस्तुजू मुझे इक ऐसे शख़्स की यारो

जो ख़ुश-मिज़ाज भी हो और दिल का सादा हो


3.किसी की चाह में दिल को जलाना ठीक है क्या


ख़ुद अपने आप को यूँ आज़माना ठीक है क्या


शिकार करते हैं अब लोग एक तीर से दो

कहीं निगाह कहीं पर निशाना ठीक है क्या


बहुत सी बातों को दिल में भी रखना पड़ता है

हर एक बात हर इक को बताना ठीक है किया


गुलाब लब तो बदन चाँद आतिशीं रुख़्सार

नज़र के सामने इतना ख़ज़ाना ठीक है क्या


तमाम शब मिरी आँखों का ख़्वाब रहते हो

तमाम रात किसी को जगाना ठीक है क्या


कभी बड़ों की भी बातों का मान रक्खो 'शम्स'
हर एक बात में अपनी चलाना ठीक है क्या

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Saturday, 26 March 2022

BHADUR SHA JAFAR KE MASHUR SHER

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जफर का जन्म 24 अक्तूबर, 1775 में हुआ था। उनके पिता अकबर शाह द्वितीय और मां लालबाई थीं। अपने पिता की मृत्यु के बाद जफर को 28 सितंबर, 1837 में मुगल बादशाह बनाया गया। यह दीगर बात थी कि उस समय तक दिल्ली की सल्तनत बेहद कमजोर हो गई थी और मुगल बादशाह नाममात्र का सम्राट रह गया था।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की जफर को भारी कीमत भी चुकानी पड़ी थी। उनके पुत्रों और प्रपौत्रों को ब्रिटिश अधिकारियों ने सरेआम गोलियों से भून डाला। यही नहीं, उन्हें बंदी बनाकर रंगून ले जाया गया, जहां उन्होंने सात नवंबर, 1862 में एक बंदी के रूप में दम तोड़ा। उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है। आज भी कोई देशप्रेमी व्यक्ति जब तत्कालीन बर्मा (म्यंमार) की यात्रा करता है तो वह जफर की मजार पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देना नहीं भूलता। लोगों के दिल में उनके लिए कितना सम्मान था उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तान में जहां कई जगह सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है, वहीं पाकिस्तान के लाहौर शहर में भी उनके नाम पर एक सड़क का नाम रखा गया है। बांग्लादेश के ओल्ड ढाका शहर स्थित विक्टोरिया पार्क का नाम बदलकर बहादुर शाह जफर पार्क कर दिया गया है।

1857 में जब हिंदुस्तान की आजादी की चिंगारी भड़की तो सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने उन्हें हिंदुस्तान का सम्राट माना और उनके नेतृत्व में अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी। अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला। भारतीयों ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी।

शुरुआती परिणाम हिंदुस्तानी योद्धाओं के पक्ष में रहे, लेकिन बाद में अंग्रेजों के छल-कपट के चलते प्रथम स्वाधीनता संग्राम का रुख बदल गया और अंग्रेज बगावत को दबाने में कामयाब हो गए। बहादुर शाह जफर ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली, लेकिन मेजर हडस ने उन्हें उनके बेटे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान व पोते अबू बकर के साथ पकड़ लिया।

अंग्रेजों ने जुल्म की सभी हदें पार कर दीं। जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं। आजादी के लिए हुई बगावत को पूरी तरह खत्म करने के मकसद से अंग्रेजों ने अंतिम मुगल बादशाह को देश से निर्वासित कर रंगून भेज दिया।


बहादुर शाह ज़फ़र मुग़ल साम्राज्य के आख़िर शासक होने के साथ-साथ उर्दू शायर भी थे। उन्होंने 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया था। पेश हैं उनके लिखे मशहूर शेर


औरों के बल पे बल न कर इतना न चल निकल
बल है तो बल के बल पे तू कुछ अपने बल के चल



दौलत-ए-दुनिया नहीं जाने की हरगिज़ तेरे साथ
बाद तेरे सब यहीं ऐ बे-ख़बर बट जाएगी

इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल




इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल
दुनिया है चल-चलाव का रस्ता सँभल के चल



जो तू हो साफ़ तो कुछ मैं भी साफ़ तुझ से कहूँ
तेरे है दिल में कुदूरत कहूँ तो किस से कहूँ

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें




कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में



कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें




तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया



बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी

ये चमन यूँ ही रहेगा और हज़ारों बुलबुलें




ये चमन यूँ ही रहेगा और हज़ारों बुलबुलें
अपनी अपनी बोलियाँ सब बोल कर उड़ जाएँगी



हमदमो दिल के लगाने में कहो लगता है क्या
पर छुड़ाना इस का मुश्किल है लगाना सहल है

YE BHI PADIYEADA JAFRI KE FAMOUS SHER

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Thursday, 10 March 2022

KABIR DAS JI KE MASHUR DHOHE

Shayar ki Kalam se dil ke Arman...

कबीर दास जी के मशहूर दोहे :

Thursday, 6 January 2022

MIRJA RAFI SODA KE MASHUR SHER



Shayar ki Kalam se dil ke Arman...






सौदा का जन्म वर्ष पक्का नहीं है लेकिन कुछ तज़किरों में ११२५ हिजरी (यानि १७१३-१७१४ ईसवी) बताया गया है। वे दिल्ली में पैदा और बड़े हुए और मुहम्मद शाह के ज़माने में जिए। धर्म के नज़रिए से उनका परिवार शिया था। उनके पहले उस्ताद सुलयमान क़ुली ख़ान 'विदाद' थे। शाह हातिम भी उनके उस्ताद रहे क्योंकि अपने छात्रों की सूची में उन्होंने सौदा का नाम शामिल किया था। मुग़ल बादशाह शाह आलम सौदा के शागिर्द बने और अपनी रचनाओं में ग़लतियाँ ठीक करवाने के लिए सौदा को दिया करते थे। सौदा मीर तकी 'मीर' के समकालीन थे। ६० या ६६ की आयु में वे दिल्ली छोड़ नवाब बंगश के साथ फ़र्रूख़ाबाद आ बसे और फिर अवध के नवाब के साथ फैज़ाबाद आ गए। जब लखनऊ अवध रियासत की राजधानी बन गया तो वे नवाब शुजाउद्दौला के साथ लखनऊ आ गए। ७० की आयु के आसपास उनका लखनऊ में ही देहांत हुआ।


सौदा को क़सीदों और तंज़ के सबसे अच्छे शायरों में गिना जाता है। शुरू में वे फ़ारसी में ही लिखा करते थे लेकिन अपने उस्ताद ख़ान-ए-आरज़ू का कहा मानकर उर्दू में भी लिखने लगे। १८७२ में उनकी कुल्लियात को बंगाल रिसाले के मेजर हेनरी कोर्ट (Major Henry Court) ने अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। उनके कुछ चुने शेर इस प्रकार हैं:

१.

“ किसी का दर्द-ए-दिल प्यारे तुम्हारा नाज़ क्या समझे


जो गुज़रे सैद के दिल पर उसे शाहबाज़ क्या समझे ”


—सौदा


२.

“ इश्क़ ज़रा भी अगर हो तो उसे कम मत जान


होके शोला ही बुझे है ये शरार आख़िरकार ”


—सौदा


३.

“ ये रूतबा जाह-ए-दुनिया का नहीं कम किसी मालज़ादी से


के इस पर रोज़-ओ-शब में सैकड़ों चढ़ते-उतरते हैं ”


—सौदा


४.

“ शैख़ ने उस बुत को जिस कूचे में देखा शाम को


ले चराग़ अब ढूंढें है वाँ ता-सहर इस्लाम को ”


—सौदा


५.
“ सावन के बादलों की तरह से भरे हुए


ये वो नयन हैं जिनसे की जंगल हरे हुए ”


—सौदा


GAJAL


जो ज़िक्र बाद मेरे होगा जांनिसारों का
करोगे याद मुझी को कि वो फ़लाना था

बातें कहां गईं वो तेरी भोली-भालियां
दिल ले के बोलता है जो तू अब ये बोलियां




'सौदा' के ज़र्द चेहरे को शोख़ी की राह से
कहता है तेरा रंग तो अब कुछ निखर चला

तेरी गली से गुज़रता हूं इस तरह ज़ालिम
कि जैसे रेत से पानी की धार गुजरे है

दिल पिरोया तो है तुझे ज़ुल्फ़ में हमने लेकिन
ताब गौहर की न लावेगा ये तार आख़िरकार


यों सूरतो-सीरत से बुत कौन सा क़ाली है
पर राह मुहब्बत की दोनों से निराली है

ख़्वाह काबे में क़्वाह मैं बुतखाने में
इतना समझूं कि मेरे यार कहीं देखा है

मिट गए वो शोर दिल के, आह तब आई बहार
वरना क्या-क्या हम भी करते शहर, वीराने में धूम
रुख़सत ऐ बागबां कि तनिक देख लें चमन
जाते हैं वां जहां से फिर आया न जाएगा

ज़िंदगी महबूब, क्या-क्या है इसमें महबूबियां
बेवफ़ाई ने पर इसकी मेट दी सब ख़ूबियां


कोह का प्यारे उठाना ज़ोर मर्दों का नहीं
जो उठावे मुझ सा दिल, समझें उसे मरदाना हम

आवारगी से ख़ुश हूं मैं अपनी कि बादे-मर्ग
हर ज़र्रा मेरी ख़ाक का होवे हवापरस्त

 
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